नासदासीन नो सदासीत तदानीं नासीद रजो नो वयोमापरो यत |
किमावरीवः कुह कस्य शर्मन्नम्भः किमासीद गहनं गभीरम || (ऋग्वेद मंडल १०, सूक्त १२९)
सृष्टि से पहले सत् नहीं था, असत् भी नहीं, अंतरिक्ष भी नहीं, आकाश भी नहीं था
छिपा था क्या?, कहाँ?, किसने ढका था? उस पल तो अगम-अतल जल भी कहां था?
सृष्टि का कौन है कर्ता? कर्ता है वा अकर्ता?
ऊँचे आकाश में रहता, सदा अध्यक्ष बना रहता, वही सचमुच में जानता… या नहीं भी जानता?
है किसी को नही पता?… नही पता… नही है पता… नही है पता…!
अंतिम भाग :-
नहीं थी म्रुत्यु, जी अमरता भी नहीं, नहीं था दिन, रात भी नहीं,
हवा भी नहीं…, सांस थी स्वयमेव फिर भी…
नहीं था कोई कुछ भी, परम तत्व से अलग या परे भी…
ॐ…! ‘कर्म’ बनकर बीज पेहला जो उगा, ‘काम’ बनकर वह जगा…
कवियों, ज्ञानियो ने जाना, असत् और सत् का निकट संबंध पेह्चाना.
पेहले संबंध में… हिरण्य नीचे… परम तत्व उसपर, उपर या नीचे…
वह था बटा हुआ, पुरुष और स्त्री बना हुआ…
उपर… नीचे…
सृष्टी यह बनी कैसे? किससे? आयी है कहां से?
कोई क्या जानता है? बता सकता है?
देवाओंको नाही ग्यान… वे आये सृजन में क्यों?
सृष्टि का कौन है कर्ता? कर्ता है वा विकर्ता…
हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेकासीत ।
स दाधार पृथ्वीं ध्यामुतेमां कस्मै देवायहविषा विधेम ॥
वो था हिरण्य गर्भ सृष्टि से पहले विद्यमान
वही तो सारे भूत जाति का स्वामी महान
जो है अस्तित्वमान धरती आसमान धारण कर
ऐसे किस देवता की उपासना करें हम हवि देकर?
जिस के बल पर तेजोमय है अंबर,
पृथ्वी हरी भरी स्थापित स्थिर,
स्वर्ग और सूरज भी स्थिर…
ऐसे किस देवता की उपासना करें हम हवि देकर?
गर्भ में अपने अग्नि धारण कर पैदा कर
व्यापा था जल इधर उधर नीचे ऊपर
जगा चुके व एकमेव प्राण बनकर
ऐसे किस देवता की उपासना करें हम हवि देकर?
ॐ…! सृष्टि निर्माता, स्वर्ग रचयिता पूर्वज रक्षा कर
सत्य धर्म पालक अतुल जल नियामक रक्षा कर
फैली हैं दिशाए बाहु जैसी उसकी सब में सब पर
ऐसे ही देवता की उपासना करें हम हवि देकर…
ऐसे ही देवता की उपासना करें हम हवि देकर…
